बिहार महागठबंधन में दो नए दलों का प्रवेश: सीट-बाँट की राजनीति हुई और पेचीदा
परिचय
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तैयारियाँ ज़ोरों पर हैं। राज्य की राजनीति हमेशा से ही गठबंधन और दलबदल की वजह से चर्चा में रही है। इस बार भी हालात अलग नहीं हैं। महागठबंधन (Mahagathbandhan) में हाल ही में दो और दल शामिल हुए हैं — झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) और पशुपति पारस की लोक जनशक्ति पार्टी (LJP - फ्रैक्शन)।
इन दोनों के आने से गठबंधन का दायरा भले ही बढ़ा हो, लेकिन सीट-बाँट की राजनीति अब और भी जटिल हो गई है।
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महागठबंधन की मौजूदा स्थिति
महागठबंधन का मूल आधार राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और कांग्रेस पर टिका रहा है। इसके साथ ही वामपंथी दल — सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई (एमएल) — भी गठबंधन का हिस्सा हैं।
राजद का दावा है कि वह सबसे बड़ी पार्टी है और उसे सबसे अधिक सीटें मिलनी चाहिए।
कांग्रेस अपने परंपरागत मतदाता आधार और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान को लेकर मजबूत दावे पेश कर रही है।
वाम दल चाहते हैं कि उन्हें भी पिछली बार की तरह पर्याप्त सीटें दी जाएँ, क्योंकि 2020 के चुनाव में उन्होंने अच्छा प्रदर्शन किया था।
अब जब JMM और पारस गुट की LJP भी इस गठबंधन का हिस्सा बन गए हैं, तो सीट-बाँट की जटिलता बढ़ गई है।
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नए दलों का महत्त्व
1. झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM)
JMM मूल रूप से झारखंड की राजनीति में सक्रिय है, लेकिन सीमावर्ती जिलों में इसका प्रभाव देखा गया है।
बिहार के संथाल परगना से लगे इलाकों में JMM का कुछ आधार है।
गठबंधन में शामिल होकर JMM जनजातीय मतदाताओं को आकर्षित कर सकता है।
यह महागठबंधन की सामाजिक आधार को और व्यापक बना सकता है।
2. पशुपति पारस की LJP (फ्रैक्शन)
चिराग पासवान और पशुपति पारस के बीच हुए विवाद के बाद LJP दो गुटों में बँट गई।
पारस गुट ने महागठबंधन का दामन थाम लिया है।
इसका मकसद है कि दलित वोट बैंक को अपने साथ जोड़ा जाए।
रामविलास पासवान की विरासत का असर अब भी दलित राजनीति में गहरा है, इसलिए LJP (पारस) को नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं है।
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सीट-बाँट की चुनौती
महागठबंधन की सबसे बड़ी परीक्षा अब सीट-बाँट में है।
पहले से ही राजद और कांग्रेस में मतभेद चल रहे थे।
वाम दलों की भी सीटों को लेकर कड़ी मांग है।
अब JMM और LJP (पारस) ने भी कुछ सीटों पर दावा किया है।
👉 इसका सीधा मतलब है कि अगर सही तालमेल नहीं बना तो गठबंधन के भीतर असंतोष और बगावत जैसी स्थितियाँ पैदा हो सकती हैं।
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चुनावी असर
1. महागठबंधन का विस्तार – नए दलों के जुड़ने से गठबंधन सामाजिक समीकरणों में और मजबूत दिखेगा।
2. NDA को चुनौती – एनडीए, खासकर भाजपा और जदयू, को अब और कठिन प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ सकता है।
3. भीतरघात का खतरा – अगर सीट-बाँट में किसी दल को कम महत्व दिया गया तो वह अंदरूनी विरोध भी कर सकता है।
4. मतदाता संदेश – मतदाताओं को यह संदेश जाएगा कि महागठबंधन "सबको साथ लेने वाला" गठबंधन है, लेकिन यह तभी सफल होगा जब दलों के बीच एकता बनी रहे।
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जनता की नज़र में
बिहार की जनता हमेशा चुनाव में गठबंधनों की चाल पर ध्यान देती है।
पिछली बार महागठबंधन को जनता का अच्छा समर्थन मिला था, लेकिन सत्ता तक पहुँचने में नाकाम रहा।
इस बार मतदाता देखना चाहते हैं कि क्या वाकई ये दल मिलकर कोई मजबूत विकल्प पेश कर सकते हैं या सिर्फ सीट-बाँट में ही उलझे रहेंगे।
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निष्कर्ष
महागठबंधन में JMM और पशुपति पारस की LJP के शामिल होने से निश्चित तौर पर समीकरण बदले हैं।
इससे सामाजिक आधार और बड़ा होगा।
लेकिन असली चुनौती सीट-बाँट की है।
अगर सभी दल एकजुट होकर चुनाव लड़ते हैं, तो महागठबंधन एनडीए के लिए बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
मगर अगर मतभेद गहरे हुए तो यह विस्तार नुकसानदेह भी हो सकता है।
बिहार की राजनीति फिलहाल इसी पेचीदगी में उलझी है। अब देखना यह है कि महागठबंधन अपनी आंतरिक चुनौतियों को पार कर जनता के सामने एक साझा और मजबूत चेहरा पेश कर पाता है या नहीं।

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